"सुना और अनसुना इश्क़ "

कुछ अनसुना सा कहा मैंने, तुमने सुना क्या! 
हाँ सुना तो, पर अनसुना कर दिया तुमने 
राहें अलग करनी थी मुझसे शायद ;
इसलिए मुझसे खुद को खफ़ा किया तुमने! 
चाहत मेरे हर एक लफ्ज़ में थी.. 
पर लफ्जों को बस बनावट ही समझा तुमने 
हर वो बात कह दी मैंने तुमसे जो प्यार में कही जाती 
फ़िर भी धोखा मैंने दिया ये कहा तुमने...
तुम्हारी ख़ुशी के लिए सब मंजूर था मुझे.. 
पर अब भी खुश नहीं हो ये सुना मैंने...!! 
मिल जाऊँगा फिर उन्हीं रास्तों में जहाँ चलते थे साथ दोनों
साथ चलना हो तो आकर थाम लेना एक बार हाँथ मेरा... 


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